संध्या (लघु उपन्यास)–भाग II

(कहानी अब तक https://hemagusain27.wordpress.com/2015/09/08 )
 
२. दूसरा अध्याय :
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संध्या ने दाहिने पैर के अँगूठे  से चावल भरा  कलश  धीरे से गिरा कर नए घर में प्रवेश किआ। नई दुल्हन के आगे पीछे छोटे छोटे बच्चे दुल्हन की एक झलक पाने का प्रयत्न कर रहे थे ।
 
“मेरी चाची है,मैं  देखूँगा पहले। ” एक छोटा बच्चे ने जरा रौब से कहा।
 
“अरे जा जा ,मेरी मामी है ,मैं  देखूंगी पहले,चाहे तो मामू से पूछ लो।” एक और छोटी बच्ची ने हूल देते हुए कहा।
 
संध्या घूँघट के पीछे मुस्काये बिना न रह पायी। पत्नी,बहु,चाची,मामी ,भाभि…   एक ही पल में कितने ही मोती उसके रिश्तों  की माला में एक साथ गूँथ पड़े थे। कितना संजो के रखना होगा उसको इस माला को ,प्रेम से पिरोना होगा ,सहेज के रखना होगा।
 
“हाँ भाई हाँ सब देखेंगे , अब से यही रहेंगी ये ,हमारे साथ। पर अभी हटो ,अंदर तो आने दो  भाभी को पहले । ”  ननद की आवाज़ ने संध्या के विचारो की कड़ी तोड़ी ,साथ ही द्वार पे लगे बच्चो के जमघट की दीवार भी।
 
संध्या और उसके साथ उसके भाई- बहनो के रहने की व्यवस्था  एक सुन्दर कमरे में कर दी गई । भाई-बहनों  ने रात भर जागरण किया  था , थकान से पलके पहले ही बोझिल थीं , सो पलंग पर लेटते ही सब निद्रा देवी को समर्पित हो गए।
 
संध्या चुप-चाप पलंग  के एक कोने में बैठी रही। आँखों में अब आंसुओं के लिए जगह नही थी क्युकि उनके हर एक  कोने में अब  भविष्य के रंगीन सपने टिम -टिम टिमक रहे थे और  नज़रे गड़ी थी हथेलियों पर  रचे दूल्हे-दुल्हन के जोड़े पर। कितनी गहरी रची थी हिना इस बार उसकी हथेलियों पर ,जीवन में  पहली बार शायद।
 
“पति महाशय का भरपूर प्रेम मिलेगा ,देख लेना।” उषा ने देखते ही कहा था।
 
उषा उसकी बचपन की सहेली ,उसकी हम-राज़।  नाम के जैसे ही दोनों के स्वभाव भी एकदम विपरीत पर “अपोजिट अत्त्रेक्ट्स ” की तर्ज़ पर दोनों एक दूसरे से हमेशा से ही बेहद प्रभावित रहते थे।
 
पति महाशय का भरपूर प्रेम मिलेगा ,देख लेना।”  संध्या के चेहरे पे फिर से मुस्कान खेलने लगी। उसने दोनों हथेलियों को चेहरे के और पास ले लिया,एक गहरी श्वास से मेहंदी की सुगंध अपने भीतर खींच ली। हिना का रंग  उसके सपनों  में चढ़ने लगा था।
 
(क्रमश:)

10 thoughts on “संध्या (लघु उपन्यास)–भाग II

  1. How beautifully you have portrayed the feelings of newly wedded bride 🙂 The mixed emotions ..the pain of leaving behind the home and the joy of being in a new home 🙂 Just few hours and you become mrs someone..leaving behind your own surname garlanding the new one with a smile 🙂 Eager to read more of this 🙂

    • Yes, and it”s just not the surname changes but your own identity gets shadowed behind that new surname.Adjustment and sacrifice become your synonym, not voluntarily but deliberately.
      Thanks NJ for taking interest in my novella.Happy Reading. 🙂
      love you. ❤

      • Well said 🙂 The surname is just the beginning of the roller coaster ride 🙂 🙂 This is novella is taking us on an odyssey 🙂 I am loving it ❤
        love you too ❤

    • Sri,it’s your love for me otherwise mine is simple general hindi. Agr tune hindi literature pdi hoti to tu surprised reh jati ki itne mahan hindi ke sahityakar hue hai or kya likhte hai wo. Genuis wo sare log hai mai to bus chaya hu.

      Happy reading.. ❤

  2. Whao!!
    Hema Di.. This is getting more interesting..
    Love the way you presented every feelings in her mind… Often smiles.. often confusion…
    Great.. Waiting for the rest.. 🙂
    All love.. ❤

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