संध्या (लघु उपन्यास) भाग -III

( कहानी अब तक https://hemagusain27.wordpress.com/2015/09/09)

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विवाह संपन्न हो चुका था पर संध्या और सारंग का वैवाहिक जीवन अभी भी प्रारंभ  होना बाकी  था। संध्या चुपचाप अपने कमरे में सारंग की प्रतीक्षा कर रही थी।  संध्या के भाई बहनों  ने कब की विदा ले ली थी। संध्या ने एक नज़र अपने कमरे में डाली ।  “अपना कमरा “सोच के ही कितना अच्छा लगता था। मायके में उसे अपना कमरा अपनी दो बहनो के साथ साँझा करना पड़ता था। अब उसका खुद का अपना कमरा होगा , यही से उसके नए सफर की शुरुवात होगी, कई नए सपने बुनें जायेंगे ,प्रेम की सरिता बहेगी।

कमरा दिखने में साफ़ ,सुन्दर तो था पर वैसे नहीं था जैसे संध्या ने फिल्मों में नव-विवाहित जोड़ो के लिए सजे देखा था। ना तो सुन्दर पुष्पों की सजावट थी और ना तो  सुगंधित दीपो की  माला,उसे थोड़ी निराशा तो हुई पर जब उसने सामने की खिड़की से लुका  छिपी करते चाँद को देखा तो सारी निराशा जाती रही। दरवाज़े पर  हल्की आहट हुई,सारंग ही थे।

“हाय, ” सारंग ने मुस्कुरा कर कहा ,जवाब में संध्या भी मुस्कुरा दी।
 “संध्या ,मेरा काम ही ऐसा है की मैं अब तक तुम्हें ज्यादा समय नहीं दे पाया किन्तु अब जब हम साथ हैं तो इस नए सफर के आरम्भ से पहले हम एक दूसरे को  थोड़ा जान  लें.”

“देखो, मैं विवाह को बंधन नहीं मानता।  मेरा विचार है कि हम सबकी अपनी अपनी ‘स्पेस’ होती है जो की हमारा हक़ है। पति की स्वतंत्रता में पत्नी को और पत्नी की स्वतंत्रता में पति को बाधक नही बनना चाहिए। शादी एक ख़ूबसूरत एहसास होना चाहिए न की गले में पड़ा फांसी का फंदा ,तो मैं चाहूंगा की तुम मेरे ‘ पर्सनल स्पेस’ का सम्मान करो। ”

“जी। ” संध्या ने सहमति दी।

“मैं महिलाओं का बहुत सम्मान करता हूँ और मुझे ‘वीमेन’स लिबरेशन’ में पूर्ण विश्वास है। तुम आज की नारी हो ,शिक्षित और स्वाभिमानी। आज़ की नारियाँ स्वयंसिद्धा होतीं हैं।  मुझे उन महिलाओ से सख्त चिढ़ है जिन्हे हर वक़्त पति के नाम की बैसाखियाँ चाहिए होती है। बाज़ार जाना है तो पति चाहिए, मायके जाना है तो पति चाहिए ,किसी अवसर पे जाना है तो पति बगल में होना चाहिए ,स्टेशन से आना जाना है तो पति साथ हो,यहाँ  तक की पार्क में जाना है तो भी पति की उपस्थिति  अनिवार्य है। अरे आज कल तो लड़कियाँ रात रात का सफर अकेले कर लेती हैं। पत्नी के पल्लू से बँधकर उसके आगे पीछे  घूमूँगा ,ऐसी उम्मीद मुझसे मत करना।”

“हम्म। ”

“हाँ ,एक बात और ,मेरी  पत्नी मॉडर्न  तथा स्वावलम्बी हो तो मुझे बेहद प्रसन्नता होगी। मैं चाहता हूँ  की मेरी पत्नी के कारण  सदा गर्व से मेरा सर ऊँचा रहे ,समाज में जो मेरी एक  ”रेपुटेशन ‘है ,मेरी पत्नी उसी के अनुसार आचार व्यवहार करें। ”

“एक बात और।  मुझे घर में शान्ति चाहिए। अगर कभी मेरे माता-पिता से तुम्हे कोई दिक्कत हो तो तुम स्वयं ही उसका हल ढूंढ़ना। मेरे पास बेकार का रोना धोना सुनने समझने का समय नहीं है और ना ही दिन भर सास ससुर की बुराई करने वाली स्त्रियों के लिए मेरे मन में कोई सम्मान है । घर में एकता कपूर के सीरियल के जैसे सास-बहु का कोई प्रसंग मुझे नहीं चाहिए। वैसे अगर तुम उनका आदर करोगी और सदा उनकी आज्ञा का पालन करोगी तो ऐसा कोई अवसर कभी आएगा ही नही ,तुम समझ रही हो ना मैं क्या कहना चाहता हूँ ? ”

“जी। ”

“गुड ,अच्छा मैं  चेंज कर लेता हूँ, तुम भी कर लो। ” , सारंग नाईट ड्रैस  लिए बाथरूम की ओर चल पड़ा  और संध्या सोचती रह गयी इस सब में  ‘हम’ कहाँ था।

(क्रमश:)

17 thoughts on “संध्या (लघु उपन्यास) भाग -III

  1. I did not see this coming. So many *Conditions Apply in a relationships don’t let it remain a relationship anymore. This is getting interesting. Keep them coming, Hema 🙂

    • Sad enough,but these are the conditions that many ladies face from their husbands more or less,may be not all at a time, but yes in her life time on different occasions may be.
      Why women can’t lead a condition free married life, this question still haunts me.

  2. I’ve seen such Sarangs in reality….And this is the story of modern India where ‘progressive thinking’ means giving up on basic value system! I am glad you thought of delving on this issue, rather than the usual saas-bahu drama! Can’t wait yaar….write faaaaaaaaaaaaast!!

  3. Is he trying to make her strong or trying to change the whole Sandhya?? :/
    As Tejas bhai said.. How can it be a relationship if it have so many conditions apply.. And that too in the very first day.. Sad..

    Eagerly waiting for the next…Hema Di.. 🙂 ❤

  4. Hema one comment
    Can you elaborate the era …sometime I feel like I am reading sharat chadra.. 🙂

    Hindi is very klisht sometimes..

  5. I got late in reading this part 🙂 but better be late then never 🙂
    I don’t know where this may lead 🙂 but this is the irony of a women life 🙂 from the day 1 the expectation list is handed and you have to keep working on it throughout your life 🙂 to change yourself each and everyday 🙂 It feels is she the only one in the relationship who need a change ? what about the man ? Is he perfect ?

  6. Awesome Hema. बहुत खूब… शानदार जबरजस्त जिंदाबाद.. तेरी लेखनी का कोई जबाब नहीं… ऐसे ही हमेशा लिखती रहना,…

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