संध्या (लघु उपन्यास) ,भाग – VI

(कहानी अब तक  https://hemagusain27.wordpress.com/2015/09/15)

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“हैल्लो ,सरप्राइज सरप्राइज ..  ”  दरवाज़ा खुलते ही उषा के  प्रफुल्लित स्वर ने संध्या के मायके की सुनसान दीवारों को नई  ऊर्जा से भर दिया।

“तू.…अरे  कहाँ  से आ धमकी आज तू? ”  संध्या के लिए ये एक सुखद आश्चर्य था, पर थोड़ी निराशा भी थी। बेवक़्त डोरबेल बजी तो सोचा शायद सारंग लिवाने आये हो। कल मलमास खत्म हो गया था और आज शाम संध्या की वापसी थी। सो अपनी सबसे अच्छी सहेली को यूँ  अचानक देख कर भी संध्या पूरे  मन से प्रसन्न नहीं हो पायी। जब दिल  में वीरानी हो , तब बाहर चाहे कितने भी बसंत आये-जाये ,मन बंजर ही बना रहता है। हरियाली उस व्यक्ति से ज़रा दूर ही रहती है।

“हाँ भई ,अब तू तो जोगन बन गई है ,मोह माया से दूर हो गयी है ,पति और ससुराल के अलावा मैडम को कुछ याद नहीं तो हमें तो ख़ुद को याद दिलाना ही पड़ेगा ना । ” उषा  बेपरवाह सोफे में पसर गयी।  “ना कोई फ़ोन ,ना चैट ,क्या? हुआ क्या है तुझे? क्या करती है ऐसा सारा सारा दिन?इत्त्तनी  बिजी ? उषा इस तरह से अपनी बड़ी बड़ी आँखों को थोड़ा और फैलाती हुई बोली की संध्या की हँसी छूट गई।

“इतनी शिकायतें ? जब खुद की शादी हो जाएगी तब तुझे खुद पता चल जायेगा। ” संध्या ने तुनक के जवाब दिया।

“व्हॉटेवर !”, उसने स्टाइल से हाथ हवा में हिलाते हुए  को रफा-दफ़ा कर दिया। “बाई -द -वे , मुझे आंटी ने फ़ोन करके बताया था की तू आई हुई है तो हमने ये सरप्राइज प्लान कर दिया। आंटी कहाँ हैं ,दिख नहीं रहीं ?”

“मैं  यही हूँ  बेटा ,कहाँ जाऊँगी ?”, माँ के आते उषा ने पैर छू कर उन्हें प्रणाम किया।

“अच्छा हुआ तू आई ,अब ले जा इसे बाहर कही ,पूरा महीना घर के अंदर बिता दिया। अब तू ही बता ऐसा होता क्या ? ना कहीं आना ,ना कहीं जाना ।”

संध्या कुछ बोल पाती इससे पहले ही उषा ने सामने राखी मैगज़ीन का माइक बनाया और अंदाज़ के साथ बोली  , “फ़िकर नॉट आंटी , समस्या चाहे छोटी हो या मोटी ,लम्बी हो या या नाटी ,गोरी हो या काली, समाधान के लिए तुरंत सम्पर्क करें उषा माँ से  और सभी समस्याओं से निज़ात पायें वो भी एकदम फ्री -फ्री -फ्री । ” उषा की नौटंकिया देख कर माँ और संध्या दोनों ही हँस  पड़े।

“चल भई सैंडी, दो सेकंड में रेडी हो जा  ,हमें बाहर जाना है। आज उषा मैडम की तरफ से आपको ट्रीट दी जाएगी और साथ  में दी जाएगी एक सेंसेशनल तड़कती -भड़कती न्यूज़। टेन -टैणेन।  “

मन ना होते हुए भी संध्या मना नही कर पायी,फिर ना जाने कब उषा से मुलाक़ात हो पाये।  दोनों सहेलियाँ  “गर्ल्स डे  आउट” पे चल दीं ।

(क्रमश:)

11 thoughts on “संध्या (लघु उपन्यास) ,भाग – VI

  1. This story shows a different shade in every part. I am loving it. Special mention for “जब दिल में वीरानी हो , तब बाहर चाहे कितने भी बसंत आये-जाये ,मन बंजर ही बना रहता है।” Awesome.
    Waiting for सेंसेशनल तड़कती -भड़कती न्यूज़ 🙂

  2. “kabhi khushi..kabhi gam..”. isn’t it ? We tend to immerse ourselves deep in the sorrows that we hardly notice the joys around us. Life would be so beautiful if we treasure those little happy moments instead of lamenting the bad moments.

  3. Hema Di,
    Read the two chapters back to back.. 🙂
    Now feeling to read the whole chapters continuosly.. 🙂
    Keep on writing!!

    As Tejas Bhai said.. I loved that sentence.. That's true and it striked.. 🙂
    You are wonderful.. 🙂

  4. How beautifully you wrote those lines जब दिल में वीरानी हो , तब बाहर चाहे कितने भी बसंत आये-जाये ,मन बंजर ही बना रहता है” …how apt is sounds 🙂 If you are not happy from inside than nothing absolutely nothing from the outside could do it 🙂 and yes i loved way you have written the conversation between 3 people ..smooth ..effortless and lively ….straight from reality 🙂

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