संध्या (लघु उपन्यास),भाग – X

( कहानी अब तक https://hemagusain27.wordpress.com/2015/09/19 )

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अब तक आपने पढ़ा  की संध्या एक नवविवाहिता है जो ससुराल में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। उसका पति सारंग का व्यवहार उसके प्रति उदासीन है। संध्या कुछ दिनों के लिए अपने मायके रहने जाती है वहाँ उसे अपनी बचपन की सहेली उषा से मिलती है। उषा के साथ कुछ अच्छा समय व्यतीत करने के बाद संध्या कार से ससुराल की और निकलती है किन्तु रास्ते में उसकी कार दुर्घटनाग्रस्त  हो  जाती है। संध्या  किसी प्रकार बच तो जाती है किन्तु उसका चेहरा बुरी तरह से घायल होता है। संध्या सारंग का इंतज़ार करती है ,किन्तु ना सारंग और ना ही ससुराल से कोई संध्या को मिलने आता है। संध्या इस बात से बड़ी आहत होती है।  अब आगे… 

“मुझसे मेरी बच्ची की हालत देखी नहीं जाती ,पता नहीं किस पाप की सज़ा भुगत रही है। ”
माँ बहुत दुखी थी। जब से संध्या को वह विचार आया था,संध्या का मन विरक्त हो गया था । ना किसी से बोलती,ना खाना खाती बस चुपचाप अपने बिस्तर में बैठी रहती,अपनी हथेलियों की रेखाओं को ताकती रहती।

“माता जी, आप संध्या के ससुराल वालों से बात क्यू नहीं करती ? ” नर्स भी संध्या के इस व्यवहार से परेशान थी।

“की थी बात मैंने उन लोगो से ,बहुत मिन्नतें की ,पर वो लोग संध्या का नाम भी नहीं सुनना चाहते। ” माँ ने रुंधे गले से बताया।

“ऐसे लोगो को देख कर इंसानियत से विश्वास उठ जाता है। ” नर्स के स्वर में क्षोभ और क्रोध था।
“मैं तो ये भी नही बोल सकती उसको की बेटा रो के जी हल्का कर ले, ऐसे तो अंदर ही अंदर घुल जाएगी मेरी बच्ची। ” माँ फफक पड़ी।

“नहीं माता जी ,रोना उसकी आँखों के लिए ठीक नहीं है ,वो तो उसके “टीयर डक्ट ” पूरी तरह से नष्ट हो गए,रो नहीं सकती अब ,वरना अगर रोती तो शायद उसकी आँखों की ज्योति हमेशा के लिए बुझ सकती थी। “नर्स ने माँ को ढाँढस बँधाया , “आप फ़िक्र ना करे मैं संध्या से बात करती हूँ । ”

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“पति महाशय का भरपूर प्रेम मिलेगा ,देख लेना।” उषा ने देखते ही कहा था। कहाँ मिला प्रेम? सब बातें झूठी निकली। संध्या अपने ही विचारों में खोई थी।

“संध्या तुम बस इसलिए दुखी हो की तुम्हारा चेहरा ख़राब हो गया और तुम्हारे ससुराल वालो ने तुमसे नाता तोड़ लिया। ” नर्स संध्या के पास थी , “तुम्हें अपना दुःख इतना बड़ा दिखता है ,जानती हो जिस कार से तुम्हारा एक्सीडेंट हुआ,उसमे एक पति -पत्नी सवार थे,दोनों ही नशे में धुत। ”

संध्या को याद आया था की इंस्पेक्टर उसका बयान लेने आये थे किन्तु उसके ऊपर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की गई थी। शायद यही वजह थी।

संध्या को पहली बार ख्याल आया की कोई और भी इस दुर्घटना का शिकार हुआ था। अपने दुःख में कितनी स्वार्थी हो गई थी की दूसरों का विचार ही नहीं आया उसे।

“जानती हो कितनी बड़ी सज़ा मिली उस बेचारी को? ”

संध्या ने प्रश्नसूचक दृष्टि से नर्स की और देखा।

“उसने ना केवल अपना पति खोया पर अपना अजन्मा बच्चा भी खो बैठी। अब बताओ किसका दुःख ज्यादा है?”
संध्या का मन क्षोभ से भर गया ,पूरे शरीर में दर्द की सिहरन दौड़ पड़ी। ये पता करना मुश्किल था की ज्यादा दर्द किसके कारण था,शरीर में लगे घावों के कारण,सारंग के अमानवीय व्यवहार के कारण ,या अनजाने में दो हत्याओं के लिए दोषी हो जाने के कारण।

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उसके बाद संध्या कभी चैन से नहीं सो पायी। कभी उसे सपने में आग में झुलसते लोगों की चीख पुकार सुनाई देती ,कभी किसी बच्चे के रोने का दारुण स्वर सुनाई पड़ता ,कभी चारों तरफ़ लाशों के ढेर दिखते । संध्या चीख के उठ पड़ती।

“माँ , मैं उससे मिलने जाऊँगी। ”

संध्या के इस निर्णय से माँ चौंक पड़ी। उस मनहूस दिन को गुजरे पूरा १ महीना हो गया था ,संध्या को अस्पताल से छुट्टी मिल गयी थी। पर अभी भी उसे ‘crutches’ के सहारे की जरूरत थी। तन और मन की चोट ने संध्या को हड्डियों के ढाँचे में बदल दिया था।

“चले जाना बिट्टो ,पहले पूरी तरह से ठीक हो जाओ,फिर जहाँ मर्जी चले जाना । ” माँ ने उसे दलिया खिलाते हुए कहा। माँ अभी भी घबरा रही थी।

“नहीं माँ ,मुझे जितना जल्दी हो उससे मिलना है,माफ़ी मांगनी है उस पाप की जो मुझसे अनजाने में हो गया । ” उसने मन ही मन निर्णय ले लिया था।

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“तुमने मेरी ज़िन्दगी उजाड़ के रख दी ,खुद का घर बसा नहीं पाई तो मेरा घर भी ढहा दिया।”
वह ज़ोर ज़ोर से चीख रही थी । सुनी मांग थी ,सूजी आँखे थी। सफ़ेद साडी में लिपटा जर्जर पड़ा शरीर गुस्से में थरथरा रहा था। “तुमने मारा है मेरे बच्चे को ,तुमने जान ली है मेरे पति की। देखो ,देखो अभी भी तुम्हारे हाथ उनके खून से रँगे हुए हैं। ”

संध्या ने अपने हाथ देखे ,सचमुच उसके हाथो से खून टपक रहा था।

संध्या चीख़ मार कर उठ पड़ी। पसीने से सारा शरीर लथपथ था। संध्या ने राहत की सांस ली ,सपना ही था। थोड़ा सांस में सांस आई।उठी ,सिरहाने में रखा पानी का जग उठाया और पानी पिया। मुझे उससे मिलना ही होगा ,जब तक वह मुझे माफ़ नहीं कर देती ,ये सपने मुझे जीने नहीं देंगे ,संध्या ने मन ही मन संकल्प लिया और भोर की पहली किरण के साथ उसने नर्स को फोन किया और उससे उनका पता लिया।

टैक्सी बुलाई और अगले एक घंटे के भीतर वह उनके घर के बाहर खड़ी थी। डोर-बैल बजने के थोड़ी देर बाद एक अधेड़ उम्र की महिला ने दरवाज़ा खोला। दरवाज़ा खुलते ही ठीक सामने उस व्यक्ति की हार चढ़ी तस्वीर लगी थी ,जिसकी हत्या का भार संध्या झेल नहीं पा रही थी।

“किससे मिलना है आपको?”, उस उधेड़ उम्र की महिला का स्वर उसे दूर कहीं से आता सुनाई पड़ा।

संध्या जड़ रही गई। उसका सर घूम गया ,आँखों के आगे अँधेरा छा गया। मुँह से बस एक शब्द निकला , “सारंग… ” और धप्प से ज़मीन पे बेसुध हो गिर पड़ी।

अभागन अपने दुर्भाग्य पर रो भी ना सकी।

(क्रमश:)

17 thoughts on “संध्या (लघु उपन्यास),भाग – X

  1. OMG …This was something totally unexpected ……..Hema you are truly genius buddy ❤ such an mind blowing twist 🙂 … you didn't left any loop holes in the story nobody could have expected this turn in the story 🙂 ….Now I would like to see what story you wove for elaborating this turn 🙂

    • I am so relieved NJ, TJ and Sri read my story but didn’t comment I was losing hope as I didn’t recieve any response from you either,I wondered whether doing that thing didn’t go too well with the readers.But now reading your comment,I am sure about my next Chapters.
      Your comment did mean a lot to me.
      Thank you .. 🙂
      Love.. ❤

      • I know that feeling dear when you write something and you expect your few loyal readers to comment on it …I read it as soon as you you told me…but it was lunch time and I was dragged in the middle of my reading it …so I my commenting got delayed 😦 And I know Sri and TJ must have been busy somewhere and soon you will get the positive feedback from them too 🙂
        You are writing a great piece honey ❤ So keep going 🙂 I am with you ❤

  2. This is the twist that I was waiting for! This is brilliant. What comes next is going to show the brilliance of your writing even more. I can not wait for the next post Hema. Amazing plot. Great carry. Keep it up. So proud of you! 🙂

  3. OH OH OH my God.. What a terrific twist!!

    Was busy at site.. Got back to work desk now only.. 🙂 That’s why I am late..
    Hema Di.. How wonderful are your imaginations.. Whenever I read a novel I always wondered about the author.. I always respect their way of thinking.. and now!! I am encountered by another wonderful author.. Respect you dear.. 🙂

    Waiting for the next!! 🙂
    Come up with the next soon.. ❤

    • And that was the response I was dying to see from you.I had my own doubts weather you all will like it or not ,an I am soooooooooo happy,as I am reading your wonderful comments. ,you can’t even imagine that.
      Lots and Lots of Love. 🙂

      • No way to unlike this.. 🙂
        We all are dying to read this wonderful creation from you!!
        And really enjoying this roller coaster story of life and realities.. 🙂

        Am now living with Sandhya!! When I read this, m all into it.. 🙂

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