संध्या (लघु उपन्यास),भाग – XIII

(कहानी अब तक  https://hemagusain27.wordpress.com/2015/09/23 )

fotolia_70653545

अब तक आपने पढ़ा  की संध्या एक नवविवाहिता है जो ससुराल में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। उसका पति सारंग का व्यवहार उसके प्रति उदासीन है। संध्या कुछ दिनों के लिए अपने मायके रहने जाती है वहाँ उसे अपनी बचपन की सहेली उषा से मिलती है। उषा के साथ कुछ अच्छा समय व्यतीत करने के बाद संध्या कार से ससुराल की और निकलती है किन्तु रास्ते में उसकी कार दुर्घटनाग्रस्त  हो  जाती है। संध्या  किसी प्रकार बच तो जाती है किन्तु उसका चेहरा बुरी तरह से घायल होता है। संध्या सारंग का इंतज़ार करती है ,किन्तु ना सारंग और ना ही ससुराल से कोई संध्या को मिलने आता है। संध्या इस बात से बड़ी आहत होती है। उसे पता चलता है की जिस कार से उसकी कार दुर्घटनाग्रस्त हुई थी ,उसमे बैठा  एक मृत्यु हुई थी और एक गर्भवती का गर्भ नष्ट हुआ था ,संध्या उस महिला से मिलने जाती है ,तब उसके सामने कटु सत्य आता  है की जो व्यक्ति मरा वह और कोई नहीं उसका पति सारंग था। संध्या अपना मानसिक संतुलन खो बैठी।संध्या की सहेली उषा ,संध्या और उसकी माँ को अपने साथ मुंबई ले चलती है।  अब आगे…

“ठीक है, तो फिर शाम को ,शार्प एट  4 ओ ‘क्लॉक।  बाय। “

संध्या और माँ को उषा के साथ रहते हुए अभी 1 सप्ताह ही हुआ था।

“आंटी ” उषा ने कॉल काटते  ही माँ को आवाज़ दी।

“हां ,बेटा। ” माँ रसोई से हाथ पोंछते हुए आई।

“आंटी ,मेरा एक दोस्त शाम को संध्या को लेने आएगा ,चिराग़ नाम है उसका। आज संध्या को मैं नहीं ले जा पाऊँगी थेरेपिस्ट के पास ,मेरी बहुत जरूरी मीटिंग है आज। आप समझा देना संध्या को। ”

“पर बेटा ,किसी को तकलीफ़ देने की क्या जरुरत है ,संध्या अब काफी हद तक ठीक है। मैं ले जाऊँगी उसे थेरेपिस्ट के पास। ”

“नहीं आंटी ,संध्या शांत है पर ठीक नहीं हैं। उसे चिराग़ के साथ ही जाना होगा। और आप अब आराम करिये ,अगर सब कुछ वैसा हुआ जैसे मैं सोच रही हूँ तो  बहुत जल्दी हमें हमारी संध्या वापस मिल जाएगी। ”

“मतलब ?” माँ हैरानी से उषा को ताकने लगी।

“बस यूँ समझिए की संध्या के धुंधलके को मिटाने  के लिए चिराग़ की रौशनी की जरुरत है। ”

“बेटा ,तुम क्या बोल रही हो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। ”

“विश्वास रखिये आंटी ,जो हो रहा है संध्या के भले के लिए ही हो रहा है। ”  माँ आश्चर्य से उषा को निहार रही थी ,मंद मंद मुस्काती उषा उसे किसी देवी से कम नहीं लग रही थी।

संध्या के जीवन में अब एक नया साथी था ,शायद भोर होने वाली थी।

—————————————————————————————————————————————–

 “संध्या तुम्हारे जीवन में सबसे महत्वपूर्ण इंसान कौन है। ” संध्या और चिराग़ मुंबई के एक बड़े माल के फ़ूड कोर्ट में बैठे थे। पिछले एक माह से वही उनका ‘मीटिंग -पॉइंट ‘ था।

संध्या ने कोई जवाब ना दिया।

“संध्या?”

“हम्म…… क्या… ?” संध्या किसी  सपने से जागी  हो जैसे।

“मैंने पूछा की तुम्हारे जीवन में सबसे महवपूर्ण इंसान कौन है ?”

“मेरी माँ। “

“फिर से सोच के बोलो। ” चिराग ने ज़ोर दे के बोला।

“क्यों ,माँ ही है। “

“ग़लत ,तुम्हारे जीवन में जो सबसे महत्त्वपूर्ण इंसान है वह है तुम खुद। ” कितनी सीधी  साधारण की थी चिराग़ ने , “और खेद की बात ये है की सबसे ज्यादा हम अगर किसी के साथ अन्याय करते है तो वह है खुद के साथ,जो तुम  कर रही हो अभी ,खुद के साथ।  “

“तुम नहीं समझते चिराग़ ,तुम पर बीती नहीं है। “

“ठीक कहती हो की मुझ पर बीती नहीं है ,पर क्या तुम जानती हो कि तुम पर क्या बीती है ?”

संध्या नजरे नीची करे चिराग़ की बात सुनती रही। चिराग़ की आवाज़ में वह मिठास और अपनापन था जो सीधे संध्या के अंतर्मन में असर करती थी। उसकी धीमी आवाज़ उसके हृदय और मस्तिष्क में ज़ोर-ज़ोर से गूंजती थी।

“संध्या एक आदमी अपनी ब्याहता बीवी की उपेक्षा करता है ,क्या यह ठीक है? हाँ या नहीं में जवाब दो “

“नहीं ” संध्या हिचकते हुए बोली।

“विवाहित होते हुए भी दूसरी शादी करता है ,अपनी पहली पत्नी को धोखा देता है ,क्या यह ठीक है ?”

“नहीं। पर ये बात अलग है और अपने खुद के पति की जान लेना अलग बात है चिराग़। अनजाने में ही सही मैंने खुद को विधवा बना दिया। “

“जिस इंसान ने तुम्हे कभी पत्नी का दर्जा दिया ही नहीं ,उसकी सुहागन कैसे हुई तुम ? बस मांग में सिन्दूर गले में मंगलसूत्र टांगने से कोई सधवा नहीं होती संध्या। “

संध्या इस बार मौन रही।

“संध्या ,थोड़ा दिमाग से सोचो ,उस एक्सीडेंट में तुम्हारे चेहरा हमेशा के लिए विकृत हो गया ,तुम्हारी जान तक जा सकती थी। उस आदमी ने ना केवल खुद की जान ली पर अपने साथ दूसरी ज़िंदगियाँ भी बर्बाद कर दी। ये ही सच है संध्या ,वह आदमी कारण था ,तुम नहीं। पाप तुम्हारे साथ हुआ है और खुद को दोषी मान कर तुम खुद के साथ अन्याय कर रही हो। एक बार तुम संध्या के क़िरदार से निकल कर दूसरों की आँखों से खुद को देखो,निष्पक्ष बनकर।  “

चिराग की आवाज़ अब भी धीमी थी, संध्या अब भी मौन थी।

“चलो ,घर चले। ” एकाएक  संध्या उठ खड़ी  हुई।

“सुनो ” ,चिराग़ ने आवाज़ दी तो संध्या एक पल के लिए ठिठक गई, आँखों में सवाल लिए।

“जानती हो तुम्हारे ‘टीयर -डक्ट’ क्यों नष्ट हो गए ?”

संध्या की आँखों में सवाल गहरा गया।

“क्योंकि ईश्वर भी अब कभी तुम्हारी आँखों में आँसू नहीं देखना चाहता। ” चिराग मुस्कुरा दिया।

संध्या माँ के बगल में करवटें बदल रही थी। रात का सन्नाटा ,चिराग़ की बातों को दोहरा रहा था। संध्या ने  अपने दोनों कान बंद कर लिए।

(क्रमश:)

12 thoughts on “संध्या (लघु उपन्यास),भाग – XIII

  1. Wow I was waiting for this one since morning 🙂 and what a beautiful one 🙂 changing some one’s perspective is the most difficult thing to do 🙂 and it requires lot of patience and calmeness to do so 🙂 I know why you named the new character chirag 😉 some one who will bring light into the darkened life of sandhaya 🙂 will the next part be the last one ??

  2. Arrey wah…aisa twist toh maine nahi sochi thi! But I really, really, really do not want ‘Sandhya’ to get over….I have fallen in love with this ‘laghu’ upanyas…And I really wish this becomes a real upanyas one day…in printed pages!

    • An end has a start and a start has an end ;That’s the law of nature Sri,we have to abide by it..you have been always with me throughout the novella,an inspiration ,a motivator…Thanking you is not enough…
      love you so much dear sister…
      lots of lots of Hugs n kissis.. ❤ ❤ ❤

  3. Hema Di,

    You are awesome.. I have to find another word to describe your writing..
    How wonderfully you are changing the plot… I am in love with your Sandhya already.. When I read this I m living with her.. She is happening around me.. Thanks for bringing light in the darkness… You are always great in that.. 🙂
    I wish this novella never end.. I need this to be published and reach all around the world..

    Now eagerly waiting for the last chapter.. The last makes me sad..
    Keep on writing.. We are waiting!!
    Love You!! 🙂

    P.S : My Hindi improved alot.. Thanks Sandhya.. 🙂 ❤ 🙂

  4. Dearest Nimz,
    I don’t know where this novella stands in terms of quality and entertainment,but the thing i ma quite sure about it that it has been lucky to me ,for I got to meet two more gems of a person, you and NJ…
    So I am glad I wrote Sandhya, i don’t know whether i ‘ll publish it or not but it did wonders to me..

    P.S. I have already written the last chapter. 🙂
    P.P.S I am proud of you ,you are a rockstar!! ❤ ❤

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s