संध्या (लघु उपन्यास) भाग -IV

(कहानी अब तक  https://hemagusain27.wordpress.com/2015/09/10 )

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“Dreams and Memories are two strings of same violin that play in the mind and vibrate in the heart.”

“वाह! अद्भुत !” सारंग  विस्मित एक अंग्रेजी उपन्यास ‘The Forgotten Lanes’ में डूबा था। “सही तो कहा है ,ये लय -ताल ही तो हैं ,जो संगीत बन के हमारे अचेतन मन में लहर की भांति बहती रहती है।  “Dreams and memories..वाह,क्या खूब लिखती है ये लेखिका। ”

“नया उपन्यास?” संध्या कब आई ,सारंग को पता ही नहीं चला।  संध्या के लिए भी ये दृश्य कुछ नया नहीं था। सारंग का पुस्तकों के प्रति, विशेषतः उपन्यास के प्रति जुनून संध्या पिछले ६ महीने से देख रही थी। सारंग जब भी कोई नयी पुस्तक लाता तो जब तक उसे पूरा नहीं पढ़ लेता, चैन से नहीं बैठता था, अपनी सुध बुद्ध  खो बैठता था।

“मैंने पूछा नया उपन्यास ,सारंग? ” इस बार उसने थोड़ा तेज़ आवाज़ में पूछा।

“अं..हाँ। संध्या तुम्हे भी इस किताब को पढ़ना चाहिए। मालूम है , ये इस लेखिका स्टेफनी ब्लूम का  ‘डेब्यू  नॉवेल ‘  है और इसने तो बस कमाल ही कर दिया।  अंग्रेजी लेखिकाओं  की बात ही अलग है। ”

“अच्छा ,तुम कहते हो तो जरूर कोई बात होगी पर मुझे पढ़ने  की फुर्सत कहाँ है ? अच्छा देखो तो ,मैंने तुम्हारे लिए ‘रेड थाई करी बनाई ‘ है ,ज़रा टेस्ट करके बताओ तो। ”  संध्या ने  एक चम्मच करी सारंग की और बढ़ाई।

“अरे , संध्या क्या कर रही हो?  तुम भी अजीब हो , मैं तुम्हे साहित्यिक बातें कर रहा हूँ  और तुम ये अपना करी वरी  ले के बैठी हो। तुम भारतीय स्त्रियों को खाने के अलावा कुछ सूझता है क्या?” सारंग की आवाज़ में खीज थी।

“सारंग , मैंने  ‘स्पेशली’  तुम्हारे लिए ही बनाई है , थोड़ा टेस्ट कर लो ना  , मेरा मन रखने के लिए ही सही। ”  संध्या ने फिर कटोरी और चम्मच सारंग की और बढ़ाई।

“संध्या , अभी मन नही है मेरा और  फॉर गॉड  सेक ये लहसुन अदरक की ‘स्मेल ‘ से मुझे बक्शा करो। कहाँ  मैं कला और ‘क्रिएटिविटी’की बात कर रहा हूँ और तुम जब देखो अपनी ये रसोई ले के आ धमकती हो।  ” ,  ताना संध्या के दिल में तीर की भाँति चुभ गया।

“तो क्या खाना बनाना कला नहीं है? इसमें तुम्हे कोई क्रिएटिविटी नहीं दिखती ? “,  अब बारी सारंग की थी।

“अरर.अरे ये अलग है संध्या , मोर  ऑफ़ एन  इंटेलेक्चुअल टाइप , ये सब बुद्धिजीवियों की श्रेणी में आती हैं। अगाथा क्रिस्टी ,जेन ऑस्टेन, मार्गरेट फोस्टर इन सब महिलाओं का समाज में एक ‘स्टेटस  ‘है, सम्मान है। तुम भी इनके जैसे बनो। ”

“क्या ये सब मेरे जैसे अच्छा खाना बना सकती हैं ?” संध्या ने तपाक से सारंग की ओर प्रश्न उछाला।

“ओफ़्फ़, संध्या तुम्हें कुछ समझाना भैंस के आगे बीन बजाना हैं।  कहाँ  राइटिंग और कहाँ कुकिंग? ये क्यूँ तुम्हारी तरह बनेंगी? ये तुम नहीं हो। ” सारंग की खीज बढ़  रही थी।

“वही तो मैं  कह रही हूँ  सारंग की मैं भी ये नही हूँ ,फिर क्यूँ तुम मुझे ये सब बनाना चाहते हो ?”

“हाँ , समाज में तुम्हारा मान सम्मान हो ऐसा तुम क्यूँ चाहोगी ? अपने आप  को देखा है तुमने कभी ? अपनी चॉइस देखो, कोई पर्सनालिटी ही नहीं है तुम्हारी ,और ये क्या कलर के कपडे पहनती हो तुम ,थोड़ा सोबर रंग पहना करो। ”

“सारंग , समाज में मान सम्मान इंसान अपने व्यवहार से बनता है। मानती हूँ  दीखने  में मैं  उन अल्ट्रा मॉडर्न युवतियों की तरह नहीं दिखती जो छोटे कपडे पहनने  में और गिटपिट अंग्रेजी में बात करने में अपनी शान समझती है, किन्तु मेरी खुद की पहचान है ,चाहे साधारण सी हाउस वाइफ की ही सही। रही रंगो की बात ,तो मुझे ब्राइट कलर पसंद हैं। तुम्हारे ग्रे और मटमैले रंग मुझे नीरस लगते हैं, सोबर नहीं। ”

“कुछ भी कहो तुम रहोगी फ़ूहड़ और गँवार।  बहस करवालो  बस इनसे , जो मन में आये करो  पर मुझे बक्शो। इंसान दो मिनट शान्ति से  भी नहीं बैठ सकता।”  सारंग गुस्से से दरवाज़ा पटकता हुआ कमरे से निकल गया।

संध्या का मन ग्लानि से भर गया।  बेकार ही बहस की ,सारंग का मूड ख़राब कर दिआ।

संध्या ने माँ  की दी रेसिपी बुक किचन  के कोने में बने कैबिनेट में फेंक दी।  माँ का  नुस्खा शायद आउट-डेटेड हो गया था।

(क्रमश:)

11 thoughts on “संध्या (लघु उपन्यास) भाग -IV

  1. I liked the end 🙂 How after every discussion or fight a woman heart is prone to feel guilt 🙂 Sometimes I don’t understand that whether our heart is a betrayer or a sole savior 🙂

    • That’s the irony of life isn’t it. Women, have to let it go even if it is not their fault. They are expected to let it go without creating any fuss about it.Moreover,they themselves are not at peace they are a part of something unhappy, as you said their heart is prone to feel the guilt.

      • Yeah so true it is 🙂 But I am glad that you have picked these small nuisances and have taken the initiative to write about it 🙂

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